यह देश का दुर्भाग्य रहा है कि यहां पर वर्ण-व्यवस्था के नाम पर चन्द मुट्ठी भर चतुर व्यक्तियों ने जनसंख्या के बहुभाग के अधिकारों पर डाका डालकर उसे अपना बंधुआ मजदूर बना लिया। उन चतुर व्यक्तियों ने अपने आपको शक्तिशाली बनाने का मार्ग तो प्रशस्त किया ही, साथ ही बहुसंख्या की जनशक्ति को विद्या, हथियार चलाने तथा धनोपार्जन से भी वंचित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज के मध्य ऊंच-नीच, भेदभाव की दीवारें उठ गई, जिसके परिणामस्वरूप भारत को हजारों वर्ष तक परतंत्र रहना पड़ा।
दलित विरोधी बताना गलत
साहित्य समाज का दर्पण है। जिस प्रकार का समाज होगा, साहित्य भी उसी प्रकार रचा जाएगा। दलित चेतना का काल हम रामायणकाल से ही मान सकते हैं, हालांकि उस समय दलितों के पक्ष में कोई खास नहीं लिखा गया और जो लिखा भी गया, वह आज की भांति न तो पैना था और न ही दलितों की पीड़ा को उकेरने वाला। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में ‘शम्भूक वध’ का वर्णन किय है। इसी प्रकार महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास ने ‘एकलव्य’ द्वारा ‘अंगूठा दान’ का वर्णन किया है। किन्तु नग्न सत्य यह है कि शम्भूक वध एवं एकलव्य का अंगूठा कटते समय क्रमश: वाल्मीकि एवं महर्षि वेदव्यास की लेखनी कॉपी नहीं। इतना ही नहीं, बल्कि उक्त दोनों महर्षियों ने इन दोनों घटनाओं की निंदा भी नहीं की है। बस एक प्रकार से सीधा-साधा वर्णन भर कर दिया है।
आजकल कतिपय व्यक्तियों द्वारा जातिगत आधार पर मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को दलित विरोधी बताए जाने की धृष्टता की जा रही है। जाति विशेष को ‘दलित’ एवं जाति विशेष के लेखन को ही ‘दलित साहित्य’ मानते हैं, जबकि समाज के दबे, कुचले, शोषित, प्रताड़ित, प्रवंचित एवं उत्पीड़ित सभी दलित हैं। यदि सूक्ष्मता से देखें तो मुंशी प्रेमचंद का सम्पूर्ण ‘साहित्य’ दलितों के संघर्ष की गाथा है।
प्रेमचंद जी को उपन्यास सम्राट कहा जाता है, किन्तु उन्होंने अनेक कहानियां भी लिखी हैं, जिनमें दलितों की पीड़ा मुखरित हुई है। उनके उपन्यास ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ तथा ‘गोदान’ तो उल्लेखनीय हैं ही, उनकी अनेक कहानियां भी ऐसी हैं जो आज भी दलितों को वाणी प्रदान करने में सक्षम हैं। कमरे और लुटेरे की लड़ाई को स्पष्ट करते हुए मुंशी प्रेमचंद ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखते हैं, ‘मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने वश में किए हुए। उन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की रियायत नहीं। इनका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाएं, खून गिराएं और एक दिन चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाएं।’
प्रेमचंद की एक कहानी का नाम है ‘सद्गति’ जिस पर सत्यजित रे ने टेलीफिल्म भी बनाई थी। कहानी में एक दलित अपनी पुत्री का लग्न निकलवाने पंडित के घर जाता है। पंडित उसे लकड़ी फाड़ने के काम में लगा देता है। वह दलित सारा दिन भूखा-प्यासा वहां लकड़ी फाड़ता रहता है और अंतत: वहीं पर उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। अब प्रश्न उसके अंतिम संस्कार का आता है। दलित लोग उसके शव को इसलिए नहीं छूते कि वह पंडित के यहां मरा था और पंडित महाराज उसे अछूत होने के कारण स्पर्श करना गंवारा नहीं करते। अंतत: किसी प्रकार पंडित महोदय उसके पैर में रस्सी बांधकर उसके शव को जंगल में फेंक आते हैं। ‘सद्गति’ में एक ब्राह्मण द्वारा एक दलित का शोषण किस प्रकार किया जाता है, यह बात बड़ी तीव्रता शिद्दत से प्रेमचंद ने उठाई है।
दलितों के पक्षधर
‘ठाकुर का कुआ’ में प्रेमचंद ने छुआछूत की भावना को इतनी गहराई से उकेरा है कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दलितों के पीने का पानी प्रदूषित है। एक दलित युवक बीमार है। यदि उसे शुध्द पेयजल मिल जाए तो उसके स्वस्थ होने की आशा बंध सकती है, किन्तु गांव में शुध्द पेयजल का केवल एक ही साधन है और वह है कुर का कुंआ। अब उस कुएं से पानी कैसे आए। उस युवक की मां रात्रि का इंतजार करती है और रात के अंधेरे में ठाकुर के कुएं से चोरी से पानी भरने का प्रयास करती है। किन्तु कुएं में डोल डाले जाने के शोर से ठाकुर साहब भाग जाते हैं और उस दलित महिला को बिना शुध्द जल लिए ही भागना पड़ता है।
‘सवा सेर गेहूं’ में बंधुआ मजदूरों की मुंह बोलती कहानी है। एक व्यक्ति के यहां संन्यासी आ जाता है। वह संन्यासी के लिए एक पंडित जी से सवा सेर गेहूं उधार लाकर उन्हें गेहूं की रोटी खिलाता है। बस यही उस दलित अथवा व्यक्ति के लिए अभिशाप बन जाता है। अनेक वर्षों तक उस दलित से पंडित जी के सवा सेर गेहूं का उधार ही नहीं उतरता और बाद में उसे तथा उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे को उस पंडित के घर बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती है। ‘कफन’ में जहां प्रेमचंद ने दलितों की ‘शराब’ पीने की बुरी आदत की ओर ध्यान आकृष्ट किया है, वहीं ‘पूस की रात’ में दलितों की निर्धनता को वाणी प्रदान की है। यदि गहराई से देखा जाए तो प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों की आवाज को बुलंद किया है। ‘मंगलसूत्र’ में मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं जिस राष्ट्र में तीन चौथाई आदमी भूखों मरते हों, वहां किसी एक को बहुत-सा धन कमाने का कोई भौतिक अधिकार नहीं है। चाहे इसकी उसमें सामर्थ्य ही क्यों न हो।’ उन्होंने छुआछूत की समस्या, दलितों को अधिकारों पर डाका डालने, जमींदारों के जुल्म तथा दलितों के श्रम की महत्ता को उकेरा है। अत: स्वयं सिध्द है कि प्रेमचंद साहित्य दलितों का पक्षधर है न कि सामंतों का।
साहित्य समाज का दर्पण है। जिस प्रकार का समाज होगा, साहित्य भी उसी प्रकार रचा जाएगा। दलित चेतना का काल हम रामायणकाल से ही मान सकते हैं, हालांकि उस समय दलितों के पक्ष में कोई खास नहीं लिखा गया और जो लिखा भी गया, वह आज की भांति न तो पैना था और न ही दलितों की पीड़ा को उकेरने वाला। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में ‘शम्भूक वध’ का वर्णन किय है। इसी प्रकार महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास ने ‘एकलव्य’ द्वारा ‘अंगूठा दान’ का वर्णन किया है। किन्तु नग्न सत्य यह है कि शम्भूक वध एवं एकलव्य का अंगूठा कटते समय क्रमश: वाल्मीकि एवं महर्षि वेदव्यास की लेखनी कॉपी नहीं। इतना ही नहीं, बल्कि उक्त दोनों महर्षियों ने इन दोनों घटनाओं की निंदा भी नहीं की है। बस एक प्रकार से सीधा-साधा वर्णन भर कर दिया है।
आजकल कतिपय व्यक्तियों द्वारा जातिगत आधार पर मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को दलित विरोधी बताए जाने की धृष्टता की जा रही है। जाति विशेष को ‘दलित’ एवं जाति विशेष के लेखन को ही ‘दलित साहित्य’ मानते हैं, जबकि समाज के दबे, कुचले, शोषित, प्रताड़ित, प्रवंचित एवं उत्पीड़ित सभी दलित हैं। यदि सूक्ष्मता से देखें तो मुंशी प्रेमचंद का सम्पूर्ण ‘साहित्य’ दलितों के संघर्ष की गाथा है।
प्रेमचंद जी को उपन्यास सम्राट कहा जाता है, किन्तु उन्होंने अनेक कहानियां भी लिखी हैं, जिनमें दलितों की पीड़ा मुखरित हुई है। उनके उपन्यास ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ तथा ‘गोदान’ तो उल्लेखनीय हैं ही, उनकी अनेक कहानियां भी ऐसी हैं जो आज भी दलितों को वाणी प्रदान करने में सक्षम हैं। कमरे और लुटेरे की लड़ाई को स्पष्ट करते हुए मुंशी प्रेमचंद ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखते हैं, ‘मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने वश में किए हुए। उन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की रियायत नहीं। इनका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाएं, खून गिराएं और एक दिन चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाएं।’
प्रेमचंद की एक कहानी का नाम है ‘सद्गति’ जिस पर सत्यजित रे ने टेलीफिल्म भी बनाई थी। कहानी में एक दलित अपनी पुत्री का लग्न निकलवाने पंडित के घर जाता है। पंडित उसे लकड़ी फाड़ने के काम में लगा देता है। वह दलित सारा दिन भूखा-प्यासा वहां लकड़ी फाड़ता रहता है और अंतत: वहीं पर उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। अब प्रश्न उसके अंतिम संस्कार का आता है। दलित लोग उसके शव को इसलिए नहीं छूते कि वह पंडित के यहां मरा था और पंडित महाराज उसे अछूत होने के कारण स्पर्श करना गंवारा नहीं करते। अंतत: किसी प्रकार पंडित महोदय उसके पैर में रस्सी बांधकर उसके शव को जंगल में फेंक आते हैं। ‘सद्गति’ में एक ब्राह्मण द्वारा एक दलित का शोषण किस प्रकार किया जाता है, यह बात बड़ी तीव्रता शिद्दत से प्रेमचंद ने उठाई है।
दलितों के पक्षधर
‘ठाकुर का कुआ’ में प्रेमचंद ने छुआछूत की भावना को इतनी गहराई से उकेरा है कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दलितों के पीने का पानी प्रदूषित है। एक दलित युवक बीमार है। यदि उसे शुध्द पेयजल मिल जाए तो उसके स्वस्थ होने की आशा बंध सकती है, किन्तु गांव में शुध्द पेयजल का केवल एक ही साधन है और वह है कुर का कुंआ। अब उस कुएं से पानी कैसे आए। उस युवक की मां रात्रि का इंतजार करती है और रात के अंधेरे में ठाकुर के कुएं से चोरी से पानी भरने का प्रयास करती है। किन्तु कुएं में डोल डाले जाने के शोर से ठाकुर साहब भाग जाते हैं और उस दलित महिला को बिना शुध्द जल लिए ही भागना पड़ता है।
‘सवा सेर गेहूं’ में बंधुआ मजदूरों की मुंह बोलती कहानी है। एक व्यक्ति के यहां संन्यासी आ जाता है। वह संन्यासी के लिए एक पंडित जी से सवा सेर गेहूं उधार लाकर उन्हें गेहूं की रोटी खिलाता है। बस यही उस दलित अथवा व्यक्ति के लिए अभिशाप बन जाता है। अनेक वर्षों तक उस दलित से पंडित जी के सवा सेर गेहूं का उधार ही नहीं उतरता और बाद में उसे तथा उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे को उस पंडित के घर बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती है। ‘कफन’ में जहां प्रेमचंद ने दलितों की ‘शराब’ पीने की बुरी आदत की ओर ध्यान आकृष्ट किया है, वहीं ‘पूस की रात’ में दलितों की निर्धनता को वाणी प्रदान की है। यदि गहराई से देखा जाए तो प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों की आवाज को बुलंद किया है। ‘मंगलसूत्र’ में मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं जिस राष्ट्र में तीन चौथाई आदमी भूखों मरते हों, वहां किसी एक को बहुत-सा धन कमाने का कोई भौतिक अधिकार नहीं है। चाहे इसकी उसमें सामर्थ्य ही क्यों न हो।’ उन्होंने छुआछूत की समस्या, दलितों को अधिकारों पर डाका डालने, जमींदारों के जुल्म तथा दलितों के श्रम की महत्ता को उकेरा है। अत: स्वयं सिध्द है कि प्रेमचंद साहित्य दलितों का पक्षधर है न कि सामंतों का।
No comments:
Post a Comment