Monday, 23 September 2013

महिला अधिकार के बारे में जानकारी दी


कोडरमा : दलित अधिकार सुरक्षा मंच व समर्पण संस्था के तत्वावधान में एचजी किसान क्लब व मनरेगा वाच ग्रुप का प्रशिक्षण शिविर लगा. स्वप रीना शर्मा, गुलशन नाज व मेरियन सोरेन ने लोगों को महिला अधिकार व उससे संबंधित कानून की जानकारी दी.
प्रकल्प के जिला समन्वयक उमेश कुमार ने स्वच्छता के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका व स्वच्छता समिति के क्रियाकलापों की जानकारी दी. इस मौके पर दलित अधिकार सुरक्षा मंच के बालेश्वर राम, समर्पण के सचिव इंद्रमणि, क्रेज के तुलसी कुमार, पंसस गणेश दास, अधिवा शिवनंदन शर्मा ने भी अपने विचार रखे.
प्रतिभागियों में हबीब राज, बसंती, अजीम उल्लाह शेख, राजकुमार, देवली देवी, मेनकी देवी, सखिया देवी, यशोदा देवी, शिबा देवी, कुंती देवी, रीतिया देवी, मालती देवी, धौली देवी, सावित्री देवी, सोहना देवी, पेमिया देवी आदि मौजूद थे. धन्यवाद ज्ञापन बसंती देवी ने किया.

अकाल व सुखाड़ से तंग है जनता : विनोद Updated on: Fri, 20 Sep 2013 01:10 AM (IST)


लेस्लीगंज, पलामू : पलामू को अकाल क्षेत्र घोषित करने की मांग को लेकर दलित अधिकार सुरक्षा मंच के तत्वावधान में प्रखंड कार्यालय में धरना दिया गया। धरना में मंच के प्रदेश संयोजक विनोद कुमार ने कहा कि पलामू की जनता अकाल व सुखाड़ से तंग है। जिला में विकास के नाम पर अरबों रूपया खर्च जरूर हुआ है। पर जल व भूमि का समेकित प्रबंध नहीं हो पाया। सरकारी व राजनीतिक उदासीनता के कारण गरीबी, भूख व अकाल का सामना करने के लिए यहां की जनता विवश है। इसका अब तक स्थायी समाधान नहीं खोजा जा सका है। इस बार पुन: पलामू अकाल की चपेट में आ चुका है परंतु सरकार चुप्पी साधे बैठी है। उन्होंने धरना के माध्यम से पलामू प्रमंडल को अकाल क्षेत्र घोषित करने, गांव स्तर पर राहत शिविर चलाने, पंचायत स्तर पर कोष की व्यवस्था, 50 क्विंटल अनाज उपलब्ध कराने, किसानों को 24 घंटा बिजली मुहैया समेत कई मांग संबंधित ज्ञापन बीडीओ मो आफताब आलम को सौंपा। कार्यक्रम की अध्यक्षता तारा देवी व संचालन रंजय राम ने किया। कार्यक्रम में शकुंतला देवी, जयशंकर पासवान, संजय कुमार, राजदेव वर्मा, राजमणि देवी, दुलारी देवी, नगमति देवी, मधुसूदन पांडेय, महेंद्र पासवान समेत कई लोग उपस्थित थे।
http://www.jagran.com/jharkhand/palamu-10738378.html

दलितों को अधिकार दिलाने पर बल

मधुपुर (देवघर), निसं : डॉ. भीमराव अंबेदकर झारखंड दलित समाज विकास समिति, संपूर्ण ग्राम विकास केंद्र डाल्टेनगंज व दलित अधिकार सुरक्षा मंच के तत्वावधान में मंगलवार को दलित सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसका उद्घाटन कमला जी ने डॉ. अंबेडकर की तस्वीर पर माल्यार्पण कर किया। मंच के जिला संयोजक रामू आनंद ने कार्यक्रम के उद्देश्यों व दलितों के अधिकार के संदर्भ में विस्तार से बताया।
मौके पर नवनिर्माण आदिवासी विकास केंद्र की सचिव प्रशांति मुर्मू, विशिष्ट अतिथि प्रेमलता रंजू द्वारा गरीबों के बीच कंबल का वितरण किया गया। सम्मेलन में फुलची, पथरा, पाथरौल, सबेजोर, पहाड़पुर, भेड़वा पंचायत के सैकड़ों महिला-पुरुषों ने भाग लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में गीता देवी, ललिता देवी, शोभा देवी, चांदनी स्वयं सहायता समूह, दुर्गी देवी, सावित्री देवी, प्रीति कुमारी, पुष्पा देवी आदि की अहम भूमिका रही।

दलितों का सर्वागीण विकास मूल मकसद

Updated on: Mon, 09 Sep 2013 01:05 AM (IST)

मधुपुर : स्थानीय डालमिया धर्मशाला में रविवार को दलित अधिकार सुरक्षा मंच द्वारा जिला स्तरीय युवा सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के लिए समाज के निचले स्तर के लोगों को एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया गया। इसके पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन पूर्व नपा अध्यक्ष फैयाज कैशर ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर पर माल्यार्पण कर किया। अध्यक्षता वार्ड सदस्य गोपाल दास व मंच संचालन रामरत्न दास ने किया। अन्य वक्ताओं ने कहा कि सम्मेलन का मुख्य मकसद दलितों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्थिति का चर्चा कर समुदाय को संवैधानिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना है। शोषण, भेदभाव के खिलाफ जागृति पैदा करने से समाज सबल हो सकता है। दलितों के प्रति अच्छी सोच रखने वाले युवा नेतृत्वकत्र्ता की पहचान एवं दलित अधिकार सुरक्षा मंच ग्राम स्तरीय संगठन बनाना है। सम्मेलन में प्रखंड महिला प्रसार पदाधिकारी उमा चौरसिया, रामू आनंद, हरिहर चौधरी, पंकज सिंह, सावित्री देवी, अस्तानंद झा, राजेश दास, अशोक दास, सुधा टुड्डू, ज्योति, शंकर दास, अशोक मांझी, अरुण मेहरा आदि उपस्थित थे।

ग्रामसभा की मजबूती से ही समाज की समृद्धि : एक्का

भास्कर न्यूज त्न कोडरमा
दलित अधिकार सुरक्षा मंच और समर्पण के संयुक्त तत्वावधान में झुमरी पंचायत भवन में दलित चिंतकों व पंचायत जनप्रतिनिधियों की बैठक हुई। बैठक में दलित समुदाय को विकास के मुख्यधारा में जोडऩे, बीपीएल सूची में हुई गड़बडिय़ों व दलित उत्पीडऩ अधिनियम को प्रभावी बनाने सहित कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा की गई।

बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में किश्चियन एड, नई दिल्ली से आये मारियनुस एक्का ने कहा कि दलित समाज आज हर दृष्टिकोण से काफी पीछे है। ऐसे समुदाय को आगे लाने की नैतिक जवाबदेही समाज के सभी बुद्धिजीवी वर्ग की है। उन्होंने कहा कि ग्राम सभा जितना मजबूत और जागरूक होगा, समाज उतना ही समृद्ध और खुशहाल होगा।

जिला विधिक सेवा प्राधिकार के बालेश्वर राम ने कहा कि गांव व पंचायत स्तर पर गठित विभिन्न समितियों की नियमित बैठक कर स्थानीय मुद्दों पर लगातार चर्चा करने व अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए संबंधित विभाग को सक्रिय करने के लिए समाज को आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि कानून की किताबों में कई अधिकार दर्ज है लेकिन, अधिकार को क्षेत्र में उतरने के लिए सामूहिक पहल करने की जरूरत है। बैठक की अध्यक्षता झुमरी पंचायत के मुखिया महादेव दास ने किया। बैठक में मुख्य रूप से संपूर्ण ग्राम विकास केन्द्र, पलामू के संजय कुमार, पंसस गणेश दास, पारा लीगल वॉलेंटियर तुलसी कुमार साव, विजय पासवान, आरटीआई कार्यकर्ता विजय यादव, समर्पण के सचिव इंद्रमणि, वार्ड सदस्य संजय दास, मुंशी यादव, वीणा देवी, सलीम अंसारी, मो. उस्मान अंसारी, प्रेम यादव, विजय दास, मो. इम्तियाज अंसारी व दिनेश यादव थे।
http://epaper.divyabhaskar.co.in/koderma/112/21082013/jarkhand/1/

ग्राम सभा के जरिये ...........

अंततः उसी रास्ते से गया दलित दूल्हे का रथ


अन्ततः भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच अनुसूचित जाति के 21 वर्षीय युवक पवन नाथ कालबेलिया की बिन्दौली उसी गांव के उसी रास्ते से रोके गए रथ पर ही देर रात निकाली गई। दलितों ने बहुत ही निडरता का परिचय दिया, वे रात 9 बजे से 12 बजे तक, करीब 3 घंटे तक लट्ठ लिये खड़े देव सैनिकों के सामने दलित दूल्हे के रथ को आगे ले जाने पर अड़े रहे, इतना ही नहीं बल्कि गांव में जगह-जगह पर गाडि़यां खड़ी करके भी रास्ता अवरूद्ध करने की कुचेष्टा की गई तथा कुछ स्थानों पर अलाव तापने के बहाने आग जलाकर भी समूह में गुर्जर व रैबारी समुदाय के युवकों ने दलितों का रास्ता बंद किया, मगर पुलिस प्रशासन और जन प्रतिनिधियों व दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने दलितों के मानमर्दन के सपने को चकनाचूर कर दिया।

दलित दूल्हे के भाई तथा कालबेलिया अधिकार मंच के प्रदेश संयोजक रतननाथ कालबेलिया के अनुसार रात को उनके भाई पवन की बिन्दौली जैसे ही अम्बू गुर्जर के घर के बाहर पहुंची तो रतन गुर्जर, हरदेव गुर्जर, रतन रेबारी, नारायण रैबारी, काना गुर्जर, नारायण गुर्जर, बक्षु गुर्जर तथा गेहरू गुर्जर व उसके साथी रथ के सामने लाठियां लेकर खड़े हो गए तथा आगे जाने देने से स्पष्ट इंकार कर दिया। बिन्दौली में चल रहे दलित बरातियों के साथ भी जातिगत गाली गलौज की गई तथा कहा गया कि – ‘‘कालबेलड़ो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई रथ पर बैठकर बिन्दौली निकालने की, यहीं से वापस चले जाओं, नहीं तो जिन्दा जला दिये जाओगे।’’

यह क्षेत्र दलितों के लिए अत्याचार परक क्षेत्र है, इसी क्षेत्र में हाल के वर्षों में दलित कलाकार नाथुराम ढोली को सरेआम, दिन दहाड़े चौराहें पर कटार से निर्मम तरीके से काट डाला गया था और हाल ही में दंतेड़ी गांव की एक दलित विवाहिता की इज्जत लूटने की शर्मनाक हरकत की गई थी, विफल रहने पर बलात्कार की कोशिश के आरोपियों ने पीडि़ता का पांव तोड़ डाला था। मारपीट, गाली गलौज और भेदभाव तो इस क्षेत्र की नियति है, गुर्जर बाहुल्य इस क्षेत्र के दलित सचमुच नारकीय जिन्दगी जीने को मजबूर है। एक तो वे संख्या में बहुत ही कम है, दूसरे राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक भी उनकी पहुंच बेहद कम है, फलस्वरूप् अत्याचार और उत्पीड़न का दर्दनाक दौर अब भी जारी है।

अत्याचार और अन्याय, उत्पीड़न की इस प्रयोगशाला में कुछ वर्ष पूर्व रतननाथ की शादी हुई थी, उसने घोड़ी पर बैठकर तोरण के लिए जाना तय किया, इस गांव को यह कैसे बदौश्त होता सो लाठियां खिंच गई, मगर हिम्मती रतन नाथ ने आततायियों को तगड़ा जवाब दिया, घोड़े पर नहीं बैठने दिया तो वह हाथी ले आया और दूसरे दिन इसी गांव में हाथी पर बैठकर बरात लेकर गया, शादी के मौके पर राजस्थान के प्रसिद्ध कलाकार रामनिवास राव का गायन तथा लोक सनसनी राणी रंगीली का नृत्य आयोजित किया। गांव के शूद्र (पिछड़े) तो जल भुन गए कि एक अछूत कालबेलिया की यह हिम्मत! मगर कर कुछ भी नहीं पाए, तब से ही मन में रंजिश पाले बैठे है, बाद में यह युवक दलित व मानवाधिकार संगठनों के सम्पर्क में आ गया और उसने दलित अधिकार के संघर्ष की राह पकड़ ली, कई सारे मुद्दे उठाये, आन्दोलन किए, इस तरह क्षेत्र के मूक दलित मुखर हुए.  इससे गांव के ये शूद्र सुधरे नहीं बल्कि और अधिक कूढ़ मगज होकर दुश्मनी पालने लगे।

इस बीच बरावलों का खेड़ा गांव के दलित कालबेलिया परिवारों ने अपनी मेहनत के बूते अच्छे घर बनाए, बड़े-बड़े विशाल घर, गाड़ी घोड़े लाये और समृद्धि, खुशहाली, जागृति का इतिहास रचा, जिन लोगों को कोई छूना भी पसन्द नहीं करता था, उन तक जाना शुरू हुआ, जातिगत भेदभाव की दीवारें टूटने लगी, रतन नाथ का निवास क्षेत्र के दलितों के लिये उम्मीद का आशियाना बनने लगा तो पिछड़े वर्ग के ये गुर्जर और भी नाराज हुये। धमकियां देने लगे, घात लगाने लगे और सबक सिखाने की ताक में रहने लगे। अन्ततः उनकी बरसों से छिपी हुई घृणित मानसिकता कल रात (16 नवम्बर 2012) को उजागर हो ही गई, वे रतन नाथ के भाई पवन नाथ की बिन्दौली के सामने खड़े हो गये, लाठियां लेकर, रास्ते रोककर, आग जलाकर, गालियां देकर, धमकियां देते हुए, उन्होंने सोचा कि वे संख्या में बहुत है, धनबल, बाहुबल सब उनके पास है।

रात में अद्भूत नजारा था, एक तरफ देव सेना के सवर्ण हिन्दू खड़े थे, दूसरी ओर रक्ष संस्कृति की दलित सेना खड़ी थी अगर प्रशासन व पुलिस इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाते तो टकराव निश्चित ही था, दलितों ने शान से जीने का प्रण कर लिया था, अपमानित होकर जीने से तो मर जाना ही बेहतर का संकल्प लिये दलित दूल्हे का रथ कंपकंपाती ठण्ड़ी रात में भी रास्ते पर अड़ा रहा और अन्ततः उसी रास्ते से गया, तमाम अवरोधों और विरोधों को पार करके, कायर देव सैनिक पुलिस के समक्ष टिक नहीं पाये, शुरूआती विरोध के बाद अपनी मोटर बाइकों पर भाग खड़े हुए, डरपोक कहीं के, अब तक गांव में नहीं लौटे है, दलित शेरों ने पूरे गांव में शान से बिन्दौली निकाली और अब दलितों का रास्ता रोकने वाले उत्पीड़नकारियों के खिलाफ दलित अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करवाने निकटवर्ती पुलिस स्टेशन में जमा है। बहरहाल उन्होंने पुलिस को लिखित रिपोर्ट दे दी है, दलितों के हौसलें बुलन्द है, मोर्चे पर लड़ रहे इन कॅामरेड्स को जय भीम, जय जय भीम!
भंवर मेघवंशी की रिपोर्ट
http://news.bhadas4media.com/index.php/jharkhand/1871-2012-11-21-02-08-23

प्रेमचंद साहित्य में दलित चेतना

यह देश का दुर्भाग्य रहा है कि यहां पर वर्ण-व्यवस्था के नाम पर चन्द मुट्ठी भर चतुर व्यक्तियों ने जनसंख्या के बहुभाग के अधिकारों पर डाका डालकर उसे अपना बंधुआ मजदूर बना लिया। उन चतुर व्यक्तियों ने अपने आपको शक्तिशाली बनाने का मार्ग तो प्रशस्त किया ही, साथ ही बहुसंख्या की जनशक्ति को विद्या, हथियार चलाने तथा धनोपार्जन से भी वंचित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि समाज के मध्य ऊंच-नीच, भेदभाव की दीवारें उठ गई, जिसके परिणामस्वरूप भारत को हजारों वर्ष तक परतंत्र रहना पड़ा।

दलित विरोधी बताना गलत
साहित्य समाज का दर्पण है। जिस प्रकार का समाज होगा, साहित्य भी उसी प्रकार रचा जाएगा। दलित चेतना का काल हम रामायणकाल से ही मान सकते हैं, हालांकि उस समय दलितों के पक्ष में कोई खास नहीं लिखा गया और जो लिखा भी गया, वह आज की भांति न तो पैना था और न ही दलितों की पीड़ा को उकेरने वाला। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में ‘शम्भूक वध’ का वर्णन किय है। इसी प्रकार महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास ने ‘एकलव्य’ द्वारा ‘अंगूठा दान’ का वर्णन किया है। किन्तु नग्न सत्य यह है कि शम्भूक वध एवं एकलव्य का अंगूठा कटते समय क्रमश: वाल्मीकि एवं महर्षि वेदव्यास की लेखनी कॉपी नहीं। इतना ही नहीं, बल्कि उक्त दोनों महर्षियों ने इन दोनों घटनाओं की निंदा भी नहीं की है। बस एक प्रकार से सीधा-साधा वर्णन भर कर दिया है।
आजकल कतिपय व्यक्तियों द्वारा जातिगत आधार पर मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को दलित विरोधी बताए जाने की धृष्टता की जा रही है। जाति विशेष को ‘दलित’ एवं जाति विशेष के लेखन को ही ‘दलित साहित्य’ मानते हैं, जबकि समाज के दबे, कुचले, शोषित, प्रताड़ित, प्रवंचित एवं उत्पीड़ित सभी दलित हैं। यदि सूक्ष्मता से देखें तो मुंशी प्रेमचंद का सम्पूर्ण ‘साहित्य’ दलितों के संघर्ष की गाथा है।
प्रेमचंद जी को उपन्यास सम्राट कहा जाता है, किन्तु उन्होंने अनेक कहानियां भी लिखी हैं, जिनमें दलितों की पीड़ा मुखरित हुई है। उनके उपन्यास ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ तथा ‘गोदान’ तो उल्लेखनीय हैं ही, उनकी अनेक कहानियां भी ऐसी हैं जो आज भी दलितों को वाणी प्रदान करने में सक्षम हैं। कमरे और लुटेरे की लड़ाई को स्पष्ट करते हुए मुंशी प्रेमचंद ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखते हैं, ‘मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने वश में किए हुए। उन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की रियायत नहीं। इनका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाएं, खून गिराएं और एक दिन चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाएं।’
प्रेमचंद की एक कहानी का नाम है ‘सद्गति’ जिस पर सत्यजित रे ने टेलीफिल्म भी बनाई थी। कहानी में एक दलित अपनी पुत्री का लग्न निकलवाने पंडित के घर जाता है। पंडित उसे लकड़ी फाड़ने के काम में लगा देता है। वह दलित सारा दिन भूखा-प्यासा वहां लकड़ी फाड़ता रहता है और अंतत: वहीं पर उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। अब प्रश्न उसके अंतिम संस्कार का आता है। दलित लोग उसके शव को इसलिए नहीं छूते कि वह पंडित के यहां मरा था और पंडित महाराज उसे अछूत होने के कारण स्पर्श करना गंवारा नहीं करते। अंतत: किसी प्रकार पंडित महोदय उसके पैर में रस्सी बांधकर उसके शव को जंगल में फेंक आते हैं। ‘सद्गति’ में एक ब्राह्मण द्वारा एक दलित का शोषण किस प्रकार किया जाता है, यह बात बड़ी तीव्रता शिद्दत से प्रेमचंद ने उठाई है।
दलितों के पक्षधर
‘ठाकुर का कुआ’ में प्रेमचंद ने छुआछूत की भावना को इतनी गहराई से उकेरा है कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दलितों के पीने का पानी प्रदूषित है। एक दलित युवक बीमार है। यदि उसे शुध्द पेयजल मिल जाए तो उसके स्वस्थ होने की आशा बंध सकती है, किन्तु गांव में शुध्द पेयजल का केवल एक ही साधन है और वह है कुर का कुंआ। अब उस कुएं से पानी कैसे आए। उस युवक की मां रात्रि का इंतजार करती है और रात के अंधेरे में ठाकुर के कुएं से चोरी से पानी भरने का प्रयास करती है। किन्तु कुएं में डोल डाले जाने के शोर से ठाकुर साहब भाग जाते हैं और उस दलित महिला को बिना शुध्द जल लिए ही भागना पड़ता है।
‘सवा सेर गेहूं’ में बंधुआ मजदूरों की मुंह बोलती कहानी है। एक व्यक्ति के यहां संन्यासी आ जाता है। वह संन्यासी के लिए एक पंडित जी से सवा सेर गेहूं उधार लाकर उन्हें गेहूं की रोटी खिलाता है। बस यही उस दलित अथवा व्यक्ति के लिए अभिशाप बन जाता है। अनेक वर्षों तक उस दलित से पंडित जी के सवा सेर गेहूं का उधार ही नहीं उतरता और बाद में उसे तथा उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे को उस पंडित के घर बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती है। ‘कफन’ में जहां प्रेमचंद ने दलितों की ‘शराब’ पीने की बुरी आदत की ओर ध्यान आकृष्ट किया है, वहीं ‘पूस की रात’ में दलितों की निर्धनता को वाणी प्रदान की है। यदि गहराई से देखा जाए तो प्रेमचंद ने अपने साहित्य में दलितों की आवाज को बुलंद किया है। ‘मंगलसूत्र’ में मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं जिस राष्ट्र में तीन चौथाई आदमी भूखों मरते हों, वहां किसी एक को बहुत-सा धन कमाने का कोई भौतिक अधिकार नहीं है। चाहे इसकी उसमें सामर्थ्य ही क्यों न हो।’ उन्होंने छुआछूत की समस्या, दलितों को अधिकारों पर डाका डालने, जमींदारों के जुल्म तथा दलितों के श्रम की महत्ता को उकेरा है। अत: स्वयं सिध्द है कि प्रेमचंद साहित्य दलितों का पक्षधर है न कि सामंतों का।

हम भूल गए हैं डा. अम्बेडकर की चेतावनी को

हम भूल गए हैं डा. अम्बेडकर की चेतावनी को

आज डा. भीमराव अम्बेडकर का नाम भारतीय संविधान के संदर्भ में बहुत ही आदर व गौरव के साथ लिया जाता है। वे उस समय की उपज थे जब भारतीय समाज में छूआछूत व्याप्त थी व निम्नवर्ग बड़ी कठिनाइयों व जटिल परिस्थितियों से जूझ रहा था। अनुसूचित जाति या जनजातियों को समानता के अधिकार मिले ही नहीं थे। दलित वर्ग दबा, पिछड़ा, घुटन महसूस कर रहा था. उनको स्कूल, कॉलेज में दाखिला मिलता ही नहीं था, न मंदिरों में प्रवेश करने दिया जाता था। कुओं से पानी भी नहीं भरने देते थे। वे उच्च वर्ग की चाकरी मात्र के लिए ही पैदा हुए हैं, ऐसा माना जाता था। शूद्र पूर्ण रूप से उच्च वर्णों व्यवस्था सहस्त्रों वर्षों से प्रचलित थी। मानव अधिकार या समता की भावना का उदय ही नहीं हुआ था। जो भी अधिकार उन्हें प्राप्त हुए हैं। वे भारतीय संविधान अमल में लाने के बाद ही मिले।
गोलमेज कााेंंस में
डा. अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1861 में एक दलित महार परिवार में हुआ था। दलित परिवारों के सदस्यों पर किस प्रकार अत्याचार किए जाते हैं और उन्हैं कितने कष्ट भोगने पड़ते हैं उनके वे स्वयं भुक्तभोगी थे. अस्पृश्यता समाप्ति कानून लागू नहीं हुआ था। डा. अम्बेडकर गरीब व दलित परिवार के होते हुए बम्बई के कालेज से स्ातक बने। उनकी प्रतिभा को देखते हुए बड़ौदा के महाराज ने उनको उच्च शिक्षा दिलाते हेतु आर्थिक सहायता दी। अपने खर्चें से उन्हें विदेश भी भेजा। उच्च शिक्षा हेतु उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की। अर्थशास्त्र में स्ातकोत्तर और शोध उपाधि प्राप्त करने लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स में अर्थशास्त्र व विधि उपाधि भी उन्होंने प्राप्त कर ली।
1923 में उन्होंने बम्बई में वकालत प्रारंभ की और नामीगिरामी प्रख्यात वकील के रूप में ख्याति पाई। वे अपने जाति भाइयों की दुर्दशा से दुखी थे उनके हक में आवाज उठाने के लिए उन्होंने मूलनायक, बहिष्कृत भारत, जनता जैसे समाचार पत्र निकाले। अछूतोध्दार के लिए जगह-जगह बोर्डिंग स्कूल में दाखिले के लिए अथक प्रयास किए। कई संगठन बनाए अपने अधिकारों के लिए लड़े। जल्दी ही राजनीतिक नेता के रूप में उभरने लगे। सन् 1927 में अछूतों के लिए, उनके नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह किया। वे स्वयं अच्छे वक्ता थे। कानून के विद्वान तो थे ही। बंबई लेजिस्लेटिव असेम्बली के लिए वे चुने गए। गोलमेज कााेंस में भी उन्होंने भाग लिया। इनकी अहम् भूमिका राजनीति में देखते हुए 1942 में वायसराय की परिषद का सदस्य बनाया गया।
सर्वोत्तम सेवा उन्होंने देश को दी वह संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में थी। जिसेक लिए वे भारतीयों के हृदय में सदा के लिए अंकित हो गए। स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बनने का सौभाग्य भी उन्हें ही प्राप्त हुआ। इंडियन लेबर पार्टी और अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विषयक अनेक किताबें लिखी। हिन्दुत्व व अनुसूचित जातियों के तनावपूर्ण संबंधों को लेकर उनके गांधीजी से मतभेद भी रहे पर उन्होंने अपने सिध्दांतों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में 14 अक्तूबर 1956 यानी अपनी मृत्यु (6 दिसम्बर 1956) के 53 दिन पूर्व समता के सिध्दांत पर अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौध्द धर्म अंगीकार कर लिया।
दलित चेतना के महानायक
कुछ भी हो आज डा. अम्बेडकर दलित वर्ग के मसीहा बन गए हैं। बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी जैसे दल उन्हें उध्दारक या भगवान मानते हैं। भविष्य में उनका नाम दलित आंदोलन में और भी अधिक उभरेगा क्योंकि आज भारत में दलित ही बहुसंख्य है। यह कल्पना तो शायद डा. अम्बेडकर ने भी नहीं की होगी कि उनके अनुयायी देश में एक दिन शासन करेंगे। किसी भी प्रदेश में जाएं डा. अम्बेडकर की मूर्तियां मिलती ही हैं। लखनऊ में तो करोड़ों रुपयों की लागत से बना अम्बेडकर पार्क एक ज्वलंत उदाहरण है और आनेवाले भविष्य का संकेत कि वे कितनी प्रतिष्ठा के पात्र बन गए। कुछ लोग उन्हें संविधान के पिता भी कहते हैं। उनका योगदान संविधान में अधिक रहा इसके बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती।
लोकतंत्र व संविधान के परिपेक्ष्य में तो डा. अम्बेडकर सदा के लिए प्रासंगिक बन गए हैं। उन्होंने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब उसका सदुपयोग आर्थिक लोकतंत्र के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जाए। भारतीय संविधान के बारे में कई आक्षेप लगाए गए थे कि वह अन्य देशों के संविधान का अंधानुकरण है एवं पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। पर उन्होंने इस तर्क का निराकरण करते हुए 4 नवम्बर 1948 को प्रारूप पेश करते हुए कहा था- विधान को देश की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए हेर-फेर किए गए हैं। जहां तक आरोपों का संबंध है कि संविधान के प्रारूप में भारत शासन एक्ट 1935 के अधिकांश प्रावधानों को ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया है तो इसके बारे में मैं कोई क्षमायाचना नहीं करता। किसी से उधार लेने में शर्म की बात नहीं है। इसमें कोई चोरो नहींहै। संविधान के मूल विचारों के बारे में किसी का कोई पेटेंट अधिकार नहीं है। संविधान के प्रति उनके मन में आशंकाएं अवश्य थी जो भविष्य में कभी भी समस्या बन सकती थी। 26 नवम्बर 1949 को अपने भाषण में चेतावनी देते हुए उन्होंने पूरी सावधानी बरतने की बात कह दी थी। उन्हीं के शब्दों में- ‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना ही अच्छा नहीं न हो यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिध्द होगा। संविधान चाहे कितना ही खराब क्यों न हो यदि वे लोग जिन्हें अमल में लाने का काम सौंपा जाए अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिध्द होगा।
उन्होंने चेतावनी देते हुए सलाह दी थी कि ‘क्या भारतवासी देश को अपने पंथ (या स्वार्थ) से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश के ऊपर रखेंगे मैं नहीं जानता लेकिन एक बार निश्छित है कि यदि राजनीतिक दल अपने पंथ (मत) को देश के ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ़ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए। हमें अपनी आजादी को खून के आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए।’ समय देश, काल भाव के अनुसार उनकी सलाह, यह चेतावनी कितनी सटीक थी। भारतीय संविधान में अनेक संशोधन तो हो चुके हैं और एक सम्पूर्ण आदर्श संविधान बनाने के लए और न जानें कितने संशोधन करने पड़ेंगे। समय-समय पर आवश्यकताएं पड़ने पर आगे बढ़ना होगा। डा. अम्बेडकर कितने दूरदृष्टा थे उनके शब्दों से पता चलता है। दलित चेतना के महानायक व मसीहा के रूप में डा. अम्बेडकर का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे सदा-सदा के लिए प्रासंगिक बने रहेंगे।