हम भूल गए हैं डा. अम्बेडकर की चेतावनी को
आज डा. भीमराव अम्बेडकर का नाम भारतीय संविधान के संदर्भ में बहुत ही आदर व गौरव के साथ लिया जाता है। वे उस समय की उपज थे जब भारतीय समाज में छूआछूत व्याप्त थी व निम्नवर्ग बड़ी कठिनाइयों व जटिल परिस्थितियों से जूझ रहा था। अनुसूचित जाति या जनजातियों को समानता के अधिकार मिले ही नहीं थे। दलित वर्ग दबा, पिछड़ा, घुटन महसूस कर रहा था. उनको स्कूल, कॉलेज में दाखिला मिलता ही नहीं था, न मंदिरों में प्रवेश करने दिया जाता था। कुओं से पानी भी नहीं भरने देते थे। वे उच्च वर्ग की चाकरी मात्र के लिए ही पैदा हुए हैं, ऐसा माना जाता था। शूद्र पूर्ण रूप से उच्च वर्णों व्यवस्था सहस्त्रों वर्षों से प्रचलित थी। मानव अधिकार या समता की भावना का उदय ही नहीं हुआ था। जो भी अधिकार उन्हें प्राप्त हुए हैं। वे भारतीय संविधान अमल में लाने के बाद ही मिले।
गोलमेज कााेंंस में
डा. अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1861 में एक दलित महार परिवार में हुआ था। दलित परिवारों के सदस्यों पर किस प्रकार अत्याचार किए जाते हैं और उन्हैं कितने कष्ट भोगने पड़ते हैं उनके वे स्वयं भुक्तभोगी थे. अस्पृश्यता समाप्ति कानून लागू नहीं हुआ था। डा. अम्बेडकर गरीब व दलित परिवार के होते हुए बम्बई के कालेज से स्ातक बने। उनकी प्रतिभा को देखते हुए बड़ौदा के महाराज ने उनको उच्च शिक्षा दिलाते हेतु आर्थिक सहायता दी। अपने खर्चें से उन्हें विदेश भी भेजा। उच्च शिक्षा हेतु उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की। अर्थशास्त्र में स्ातकोत्तर और शोध उपाधि प्राप्त करने लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स में अर्थशास्त्र व विधि उपाधि भी उन्होंने प्राप्त कर ली।
1923 में उन्होंने बम्बई में वकालत प्रारंभ की और नामीगिरामी प्रख्यात वकील के रूप में ख्याति पाई। वे अपने जाति भाइयों की दुर्दशा से दुखी थे उनके हक में आवाज उठाने के लिए उन्होंने मूलनायक, बहिष्कृत भारत, जनता जैसे समाचार पत्र निकाले। अछूतोध्दार के लिए जगह-जगह बोर्डिंग स्कूल में दाखिले के लिए अथक प्रयास किए। कई संगठन बनाए अपने अधिकारों के लिए लड़े। जल्दी ही राजनीतिक नेता के रूप में उभरने लगे। सन् 1927 में अछूतों के लिए, उनके नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह किया। वे स्वयं अच्छे वक्ता थे। कानून के विद्वान तो थे ही। बंबई लेजिस्लेटिव असेम्बली के लिए वे चुने गए। गोलमेज कााेंस में भी उन्होंने भाग लिया। इनकी अहम् भूमिका राजनीति में देखते हुए 1942 में वायसराय की परिषद का सदस्य बनाया गया।
सर्वोत्तम सेवा उन्होंने देश को दी वह संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में थी। जिसेक लिए वे भारतीयों के हृदय में सदा के लिए अंकित हो गए। स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बनने का सौभाग्य भी उन्हें ही प्राप्त हुआ। इंडियन लेबर पार्टी और अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विषयक अनेक किताबें लिखी। हिन्दुत्व व अनुसूचित जातियों के तनावपूर्ण संबंधों को लेकर उनके गांधीजी से मतभेद भी रहे पर उन्होंने अपने सिध्दांतों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में 14 अक्तूबर 1956 यानी अपनी मृत्यु (6 दिसम्बर 1956) के 53 दिन पूर्व समता के सिध्दांत पर अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौध्द धर्म अंगीकार कर लिया।
दलित चेतना के महानायक
कुछ भी हो आज डा. अम्बेडकर दलित वर्ग के मसीहा बन गए हैं। बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी जैसे दल उन्हें उध्दारक या भगवान मानते हैं। भविष्य में उनका नाम दलित आंदोलन में और भी अधिक उभरेगा क्योंकि आज भारत में दलित ही बहुसंख्य है। यह कल्पना तो शायद डा. अम्बेडकर ने भी नहीं की होगी कि उनके अनुयायी देश में एक दिन शासन करेंगे। किसी भी प्रदेश में जाएं डा. अम्बेडकर की मूर्तियां मिलती ही हैं। लखनऊ में तो करोड़ों रुपयों की लागत से बना अम्बेडकर पार्क एक ज्वलंत उदाहरण है और आनेवाले भविष्य का संकेत कि वे कितनी प्रतिष्ठा के पात्र बन गए। कुछ लोग उन्हें संविधान के पिता भी कहते हैं। उनका योगदान संविधान में अधिक रहा इसके बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती।
लोकतंत्र व संविधान के परिपेक्ष्य में तो डा. अम्बेडकर सदा के लिए प्रासंगिक बन गए हैं। उन्होंने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब उसका सदुपयोग आर्थिक लोकतंत्र के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जाए। भारतीय संविधान के बारे में कई आक्षेप लगाए गए थे कि वह अन्य देशों के संविधान का अंधानुकरण है एवं पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। पर उन्होंने इस तर्क का निराकरण करते हुए 4 नवम्बर 1948 को प्रारूप पेश करते हुए कहा था- विधान को देश की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए हेर-फेर किए गए हैं। जहां तक आरोपों का संबंध है कि संविधान के प्रारूप में भारत शासन एक्ट 1935 के अधिकांश प्रावधानों को ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया है तो इसके बारे में मैं कोई क्षमायाचना नहीं करता। किसी से उधार लेने में शर्म की बात नहीं है। इसमें कोई चोरो नहींहै। संविधान के मूल विचारों के बारे में किसी का कोई पेटेंट अधिकार नहीं है। संविधान के प्रति उनके मन में आशंकाएं अवश्य थी जो भविष्य में कभी भी समस्या बन सकती थी। 26 नवम्बर 1949 को अपने भाषण में चेतावनी देते हुए उन्होंने पूरी सावधानी बरतने की बात कह दी थी। उन्हीं के शब्दों में- ‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना ही अच्छा नहीं न हो यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिध्द होगा। संविधान चाहे कितना ही खराब क्यों न हो यदि वे लोग जिन्हें अमल में लाने का काम सौंपा जाए अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिध्द होगा।
उन्होंने चेतावनी देते हुए सलाह दी थी कि ‘क्या भारतवासी देश को अपने पंथ (या स्वार्थ) से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश के ऊपर रखेंगे मैं नहीं जानता लेकिन एक बार निश्छित है कि यदि राजनीतिक दल अपने पंथ (मत) को देश के ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ़ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए। हमें अपनी आजादी को खून के आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए।’ समय देश, काल भाव के अनुसार उनकी सलाह, यह चेतावनी कितनी सटीक थी। भारतीय संविधान में अनेक संशोधन तो हो चुके हैं और एक सम्पूर्ण आदर्श संविधान बनाने के लए और न जानें कितने संशोधन करने पड़ेंगे। समय-समय पर आवश्यकताएं पड़ने पर आगे बढ़ना होगा। डा. अम्बेडकर कितने दूरदृष्टा थे उनके शब्दों से पता चलता है। दलित चेतना के महानायक व मसीहा के रूप में डा. अम्बेडकर का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे सदा-सदा के लिए प्रासंगिक बने रहेंगे।
गोलमेज कााेंंस में
डा. अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1861 में एक दलित महार परिवार में हुआ था। दलित परिवारों के सदस्यों पर किस प्रकार अत्याचार किए जाते हैं और उन्हैं कितने कष्ट भोगने पड़ते हैं उनके वे स्वयं भुक्तभोगी थे. अस्पृश्यता समाप्ति कानून लागू नहीं हुआ था। डा. अम्बेडकर गरीब व दलित परिवार के होते हुए बम्बई के कालेज से स्ातक बने। उनकी प्रतिभा को देखते हुए बड़ौदा के महाराज ने उनको उच्च शिक्षा दिलाते हेतु आर्थिक सहायता दी। अपने खर्चें से उन्हें विदेश भी भेजा। उच्च शिक्षा हेतु उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त की। अर्थशास्त्र में स्ातकोत्तर और शोध उपाधि प्राप्त करने लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स में अर्थशास्त्र व विधि उपाधि भी उन्होंने प्राप्त कर ली।
1923 में उन्होंने बम्बई में वकालत प्रारंभ की और नामीगिरामी प्रख्यात वकील के रूप में ख्याति पाई। वे अपने जाति भाइयों की दुर्दशा से दुखी थे उनके हक में आवाज उठाने के लिए उन्होंने मूलनायक, बहिष्कृत भारत, जनता जैसे समाचार पत्र निकाले। अछूतोध्दार के लिए जगह-जगह बोर्डिंग स्कूल में दाखिले के लिए अथक प्रयास किए। कई संगठन बनाए अपने अधिकारों के लिए लड़े। जल्दी ही राजनीतिक नेता के रूप में उभरने लगे। सन् 1927 में अछूतों के लिए, उनके नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह किया। वे स्वयं अच्छे वक्ता थे। कानून के विद्वान तो थे ही। बंबई लेजिस्लेटिव असेम्बली के लिए वे चुने गए। गोलमेज कााेंस में भी उन्होंने भाग लिया। इनकी अहम् भूमिका राजनीति में देखते हुए 1942 में वायसराय की परिषद का सदस्य बनाया गया।
सर्वोत्तम सेवा उन्होंने देश को दी वह संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में थी। जिसेक लिए वे भारतीयों के हृदय में सदा के लिए अंकित हो गए। स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बनने का सौभाग्य भी उन्हें ही प्राप्त हुआ। इंडियन लेबर पार्टी और अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विषयक अनेक किताबें लिखी। हिन्दुत्व व अनुसूचित जातियों के तनावपूर्ण संबंधों को लेकर उनके गांधीजी से मतभेद भी रहे पर उन्होंने अपने सिध्दांतों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में 14 अक्तूबर 1956 यानी अपनी मृत्यु (6 दिसम्बर 1956) के 53 दिन पूर्व समता के सिध्दांत पर अपने 5 लाख अनुयायियों के साथ बौध्द धर्म अंगीकार कर लिया।
दलित चेतना के महानायक
कुछ भी हो आज डा. अम्बेडकर दलित वर्ग के मसीहा बन गए हैं। बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी जैसे दल उन्हें उध्दारक या भगवान मानते हैं। भविष्य में उनका नाम दलित आंदोलन में और भी अधिक उभरेगा क्योंकि आज भारत में दलित ही बहुसंख्य है। यह कल्पना तो शायद डा. अम्बेडकर ने भी नहीं की होगी कि उनके अनुयायी देश में एक दिन शासन करेंगे। किसी भी प्रदेश में जाएं डा. अम्बेडकर की मूर्तियां मिलती ही हैं। लखनऊ में तो करोड़ों रुपयों की लागत से बना अम्बेडकर पार्क एक ज्वलंत उदाहरण है और आनेवाले भविष्य का संकेत कि वे कितनी प्रतिष्ठा के पात्र बन गए। कुछ लोग उन्हें संविधान के पिता भी कहते हैं। उनका योगदान संविधान में अधिक रहा इसके बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती।
लोकतंत्र व संविधान के परिपेक्ष्य में तो डा. अम्बेडकर सदा के लिए प्रासंगिक बन गए हैं। उन्होंने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब उसका सदुपयोग आर्थिक लोकतंत्र के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जाए। भारतीय संविधान के बारे में कई आक्षेप लगाए गए थे कि वह अन्य देशों के संविधान का अंधानुकरण है एवं पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। पर उन्होंने इस तर्क का निराकरण करते हुए 4 नवम्बर 1948 को प्रारूप पेश करते हुए कहा था- विधान को देश की जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए हेर-फेर किए गए हैं। जहां तक आरोपों का संबंध है कि संविधान के प्रारूप में भारत शासन एक्ट 1935 के अधिकांश प्रावधानों को ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया है तो इसके बारे में मैं कोई क्षमायाचना नहीं करता। किसी से उधार लेने में शर्म की बात नहीं है। इसमें कोई चोरो नहींहै। संविधान के मूल विचारों के बारे में किसी का कोई पेटेंट अधिकार नहीं है। संविधान के प्रति उनके मन में आशंकाएं अवश्य थी जो भविष्य में कभी भी समस्या बन सकती थी। 26 नवम्बर 1949 को अपने भाषण में चेतावनी देते हुए उन्होंने पूरी सावधानी बरतने की बात कह दी थी। उन्हीं के शब्दों में- ‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना ही अच्छा नहीं न हो यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिध्द होगा। संविधान चाहे कितना ही खराब क्यों न हो यदि वे लोग जिन्हें अमल में लाने का काम सौंपा जाए अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिध्द होगा।
उन्होंने चेतावनी देते हुए सलाह दी थी कि ‘क्या भारतवासी देश को अपने पंथ (या स्वार्थ) से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश के ऊपर रखेंगे मैं नहीं जानता लेकिन एक बार निश्छित है कि यदि राजनीतिक दल अपने पंथ (मत) को देश के ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ़ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए। हमें अपनी आजादी को खून के आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए।’ समय देश, काल भाव के अनुसार उनकी सलाह, यह चेतावनी कितनी सटीक थी। भारतीय संविधान में अनेक संशोधन तो हो चुके हैं और एक सम्पूर्ण आदर्श संविधान बनाने के लए और न जानें कितने संशोधन करने पड़ेंगे। समय-समय पर आवश्यकताएं पड़ने पर आगे बढ़ना होगा। डा. अम्बेडकर कितने दूरदृष्टा थे उनके शब्दों से पता चलता है। दलित चेतना के महानायक व मसीहा के रूप में डा. अम्बेडकर का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे सदा-सदा के लिए प्रासंगिक बने रहेंगे।
No comments:
Post a Comment